मंगलवार, 24 नवंबर 2015

मेरा भारत महान

सहिष्णु____असहिष्णु____???

           तुम्हारे आदाब के अभिवादन का उत्तर नमस्कार से देते ही मैं कट्टर हो जाता हूँ । अगर सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ता हूँ तो संघी हूँ ।  अगर धोती कुरता पहनता हूँ तो भारतीय नहीं रहता तुरंत हिन्दू हो जाता हूँ । तिलक लगाने से मुझे डर है कहीं भगवा आतंकी न घोषित हो जाऊँ ।

मैं अपने ही देश में अपने तौर तरीके से क्यों नहीं रह सकता, मेरी पहचान छीनी जा रही है क्यों........????
मुझे मेरे ही घर से निकालने की ये आखिर किसकी साजिश है......????

सरकार बहुमत से चुनी जाती है और वो काम करती है अल्पसंख्यक कल्याण के लिए क्यों..........????
अगर हम बहुसंख्यक हैं और हमारे बहुमत से चुनी हमारी सरकार हमारे ही कल्याण के लिए योजनाएँ क्यों नहीं बना सकती.........????

क्यों हमें अपने पवित्र धर्म व गाय की रक्षा के लिए बकरी की तरह मिमियाना पड़ता है.......????
क्यों मुझे हिंदुत्व की बात कहने के लिए भारतीयता का आवरण ओढ़ना पड़ता है......????

हम अपने धर्म की बात आखिर अपनी ही मातृभूमि पे क्यों नहीं कर सकते.....????
क्यों मुझे ही सर्वधर्म समभाव की बात करनी पड़ती है । क्यों मैं अपने धर्म की बात दृढ़ता से कहने पे कट्टर हो जाता हूँ.........????

इन सारे क्यों का उत्तर है एक क्योंकि हम " सहिष्णु " हैं । इसलिए क्योंकि हम वसुधैव कुटुम्बकम् की नीति को मानने वाले हैं । तुम उन्हें असहिष्णु कह रहे हो जिनके पूर्वज युद्ध भी नियमों से किया करते थे सूर्यास्त के बाद शत्रु चाहे बगल में भी हो उसका वध नहीं करते थे । निहत्थे  पे वार नहीं करते थे । हमारी इन्हीं अच्छाइयों के कारण हम पराजित हुए क्योंकि हम युद्ध में भी " सहिष्णु " थे ।  जिसका परिणाम आज ये है कि तुम हमें " असहिष्णु " कह पा रहे हो ।

पृथ्वीराज चौहान क्यों तुम असहिष्णु न हुए और पहली ही बार में पराजित गोरी का सर धड़ से अलग क्यों न कर दिया.......????

तुम अभिनेता हो ,  एक बात बताओ अगर राष्ट्र में इतनी ही असहिष्णुता रही है तो तुम मुस्लिम होने के बावजूद इतने बड़े सितारे कैसे बन गए.....????  ठीक है तुम अवार्ड वापस करो पर पहले हम जैसे सभी असहिष्णुओं के वो पैसे वापस करो जो हमने तुम्हारी सारी फिल्मों के टिकट पे खर्च किये थे । सब समझ आ जायेगा जब पदक की जगह भिक्षा पात्र हाथ में आ जायेगा ।

पहनाई गई फूलों की माला को वापस करने से सम्मान वापस नहीं होता ।  अगर पुरूस्कार वापस करना है तो पुरूस्कार देने में लगा वो सारा समय भी वापस करो नहीं तो ये स्वांग बंद करो ।
अपने लिए विशेष दर्जा मांग कर समानता की बात करना जायज है क्यों......????

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

एक बाद याद रखना दोस्तों ढूंढने से वही मिलते हैं जो खो गये हैं, वो नही जो बदल गये हैं।

मेरा देश

जिस तरह का माहौल आज देश में है उसे देख कर मन बहुत व्यथित हो जाता है।अचानक से देश को हो क्या गया है? धर्म और जाति के नाम पर ये कैसा खेल खेल जा रहा है आम आदमी के जीवन से ? उस पर ये नेता जो हर वक्त सुरक्षा कर्मियों से घिरे रहते है अपने वोट की राजनीती के लिए कितना जहर उगल रहे है। इनके मनमे एक बार भी ख्याल नहीं आता की इनके इन जहरीले बातों से देश  का वातावरण कितना जहरीला होता जा रहा है।क्यों ये आम आदमी को चैन से जीने नहीं देना नहीं चाहते हैं? ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो यह किसी साजिश के तहत हो रहा है स्वतंत्रता के बाद 66 साल में किसी अन्य पार्टी का पूर्ण बहुमत से सरकार में आना कुछ लोग बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं और कुछ इसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं।इसका जो भी परिणाम निकल रहा है उसे भुगत सिर्फ आम आदमी रहा है।लगता है मेरा देश सिर्फ जाति और धर्म की आग में जलता रहेगा और ये राजनेता अपने स्वार्थ के लिए इस आग को कभी बुझने नहीं देंगे। कोई कृष्ण, कोई राम नहीं जन्म लेगा इन पापियों का अंत करने। हमें ही जागना  होगा ,हमें ही सचेत होना होगा की कोई हमारे बीच कोई राजनेता ,कोई धार्मिक नेता जहर न उगल सके।हम पहले इंसान हैं फिर किसी या जाति या धर्म के है।जाति, धर्म को आपने घर की चार दिवारी तक ही सिमित रखे घर के बाहर हम सिर्फ इंसान  रहे एक आम आदमी ।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

क्रोध

क्रोध एक ऐसा तेजाब है,जो जिस चीज पे डाला जाता है, उससे ज्यादा उस पात्र को नुकसान पहुँचता है जिसमे वो रखा है।

शनिवार, 31 अगस्त 2013

                                                 हाइकू



     १) टपकती  बूंदे
          गेसुओ  से उसके
          गिरते मोती

    २)चिलचिलाती धूप
        तपती सड़क पर अकेला
         वो दिवाना

  

         
      

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

वो लड़की


इसी आँगन में देखी थी उसे,
जब जन्म हुआ था उसका
पिता ने बजवाया था शहनाई
लाखो बार चूमा था उसे
मेरी लक्ष्मी कहकर
माँ भी धरती में नहीं
मानो आसमान में उड़ रही थी
बड़ी मन्नतो से पाया था उसे
ढेरो खुशिया लेकर आई थी
वो लड़की,
इसी आँगन .....................
अपने नन्हे नन्हे पैरों से चलते हुए
कभी गिरते तो कभी सम्हलते हुए
पिता ने थाम कर हाथ उसका
चलना सिखाया सम्हलना सिखाया
माँ ख़ुशी से झूम उठती
सुनकर लाडली की तोतली बातें
माँ बाप की आँखों का तारा थी
वो लड़की
इसी आंगन
.....................
यौवन की दलहिज पे रखा था कदम उसने
खूबसूरती की मूरत थी वो
पिता ने देखा हर सपना उसमे
माँ भी थकती नहीं निहार
निहार उसे
माँ-बाप कासपना थी
वो लड़की
इसी आँगन ...................
जब दौड़ते हुए आई थी वो
हाथो में माँ बाप का सपना लिए
जो देखा था उन्होंने
पिता आज गर्वित था इस संतान पर
माँ की खुशियाँ झलक रही थी
मुस्कुराते होठों ,भीगी पलकों से
माँ बाप का अभिमान थी
वो लड़की
इसी आँगन .....................
जब लाल जोड़े में लिपटे
बन कर दुल्हन आई वो
आँखों में सतरंगी सपने लिए
सात वचन ले सात जन्मो का साथ निभाने
चली गई पिया के संग वो
पिता के आँखों में थे अश्रुधार
माँ की भीगी पलके भी दूर तक निहार रही थी
अपने बगिया के फुल को
माँ बाप का परायाधन थी
वो लड़की
इसी आँगन .........................
जब लौट आई पीया के घर से वो
बिखर गए थे सपने उसके
टूट चुकी थी वो
मन में ढेरो
थे सवाल
खामोश निगाहें पूछ रही थी
माँ बाप से किस गुनाह की सजा है ये
पिता चुप, खामोश थे
माँ ने चुपचाप सिने से लगाया उसे
रुक नहीं सके दोनों के अश्रुधार
माँ बाप के लिए सवाल थी
वो लड़की
इसी आँगन में देख रही हूँ उसे
जब पड़ी है धरती पर वो
उसी लाल जोड़े से लिपटे
बिलकुल खामोश थी
दर्द की लकीरे थी चेहरे पर
सवालों से भरी आँखे बंद थी
उसी कंधे में फिर उठाया है पिता ने उसे
जिसमे बिठा कर घुमाया था उसे ,
उठाई थी डोली लाडली की,
आज फिर जा रही है लाडली
उसी कंधे पे हो के सवार
लाल जोड़े में लिपटे
निकल रही है द्वार से वो
माँ बाप की आँखों का तारा ,
उनका अभिमान
अन्नत में विलीन होने
आज इस आँगन में एक सन्नाटा है
जो टूटता है कभी हलकी सिसकियों से
कभी माँ की चीत्कार से
माँ बाप के लिए एक लाश है
वो लड़की
आज फिर खड़ी हूँ इसी आँगन में मै
देख रही हूँ उस लड़की को
जिसे देखा था कभी मासूम मुस्कराहट लिए
नन्हे नन्हे कदमो से चलते
तोतली जुबान बोलते
माँ बाप के सपने पुरे करते
दुल्हन बन पिया के घर जाते
अंतहीन यात्रा में जाते
आज फिर आई है इसी आँगन में वो
एक छोटे से मिटटी के पात्र में
बनकर राख
जो खो जाएगी गंगा की धार में
आज माँ बाप के लिए बस एक याद है
वो लड़की






आकाश नहीं बनना चाहती मै















आकाश नहीं बनना चाहती मै ,
वहां कुछ नहीं केवल शुन्य है,
आकाश नहीं छूना मुझे
वहां कुछ नहीं केवल ऊचाईयाँ है
आकाश नहीं देखना मुझे
वहां कुछ नहीं सूर्य की तपिश है,
चंद्रमा की जलन है
मै धरती की प्राणी
मुझे धरती में रहना है
यंहा शुन्य नहीं सारा संसार है
ऊचाईयाँ नहीं धरती की गोद है
दूरियाँ नहीं अपनों का साथ है
सूर्य की तपिश नहीं खुशियों की छांव है
आकाश नहीं बनना चाहती मै
धरती की प्राणी, धरती में रहना है

आज फिर तेरी याद आई है


आज फिर तेरी याद आई है,
जब उस सुहानी शाम को,
तुम मिले थे मुझसे ,
इसी शाख के नीचे ,
उन दो अजनबी आँखों से देखते ,
आज फिर .................
जब उस सुरमई शाम को ,
तुमने किया था अपनी मुहब्बत का इजहार ,
इसी शाख के नीचे,
उन दो प्यारी आँखों से देखते,
आज फिर...................
जब उस सिंदूरी शाम को
तुमने वादा किया था ,
जनम जनम सांथ निभाने का
इसी शाख के नीचे ,
उन दो मुस्कुराती आँखों से देखते,
आज फिर ....................
जब उस घनी शाम को
तुम आये थे मुझसे मिलने
अपने वादों को तोड़ने,
इसी शाख के नीचे,
उन दो छली आँखों से देखते,
आज फिर ..........................
इस बेनामी शाम को
जब कड़ी हूँ मै
इसी शाख के नीचे
बन के खुद से अजनबी
समेटी हुई उन यादों को
जो जिवंत थे कभी
तुम्हारे साथ,
अपनी इस निस्तेज , नीरस आँखों से देखते.

शनिवार, 27 नवंबर 2010

कुछ ज्ञान की बातें

खाली समय में अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटते समय बहुत समय पहले कंही से देख कर लिखी हुई कुछ ज्ञान की बातें पर नज़र गई सोची की इसे सबके साथ बाटा जाये।
इंसान को जीवन में एक बार मिलती है ---- माँ बाप, हुस्न, जवानी
भाई को भाई का दुश्मन बनाती है ---- जन, जर, जमीन
याद रखना जरुरी है ---- सच्चाई , कर्तव्य , मौत
असल उद्देश्य से रोकती है ---- चोरी, चुगली, झूठ
इंसान को जलील करती है ---- बदचलनी, गुस्सा, लालच
६ हर एक को प्यारी होती है ---- औरत,दौलत, औलाद
७ कोई दुसरा चुरा नहीं सकता ---- अक्ल, इल्म,हुनर
८ गम में घिरे रहते हैं ---- ईर्ष्यालु , काहिल, वहमी
९ निकल कर वापस नहीं आती ---- तीर कमान से, बात जबान से, आत्मा शारीर से
१० अपनी आदत पर मजबूर है ---- सच्चा सच्चाई पर, दानी दान पर, जालिम जुल्म पर
११ वक़्त पर पहचाने जाते हैं ---- धैर्यवान कठिनाई पर, सच्चा सच्चाई पर, भाई जरूरत पर

एक बात और अभी कुछ समय पहले टीवी पर "तारक मेहता का उल्टा चश्मा" देख रही थी जिसमे "कृष्णा बेन खाखरा वाली" से सम्बंधित एपिसोड था उसमे एक सीन में कृष्णा बेन गोकुलधाम सोसायटी में प्रवेश करती हैं और उनकी मुलाकात तुकाराम जी से होती है जो बोर्ड पर सुविचार लिख रहे होते हैं वे सिर्फ इतना ही लिखे रहते हैं की "प्रार्थना यानी" आगे उन्हें समझ नहीं आता की क्या लिखें तब कृष्णा बेन उसे पूरा करती हैं की " प्रार्थना यानि की बिना प्रीमियम का इन्शुरेन्स " है ना कितनी सच्ची बात ।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

विचार

सफल व्यक्ति कठिनाई से भरे समय में भी पूरा संतुलन बनाये रखते हैं। वे वर्तमान में जीना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है की केवल वर्तमान पर ही नियंत्रण किया जा सकता है।
सकारात्मक सोच और सफलता एक दुसरे से जुड़े हुय्र हैं, हम जिंदगी को जिस नजरिये से देखेंगे ,जिंदगी हमें वैसे ही दिखाई देगी। हमारी सोच जीतनी सकारात्मक होगी, जीने के प्रति हमारा रवैया उतना ही जोशीला होगा। जिन्दगी हमें खुदबखुद खुबसूरत दिखने लगेगी।
किसी दोस्त या करीबी के कामयाब होने पर हम यह सोचने लगें की उसकी किस्मत हमारी किस्मत से ज्यादा अच्छी है या वह हमसे जयादा काबिल है, सच बात तो यह है की ऐसी सोच ही हमें असफलता की ओर ले जाती है। हमें अपनी नकारात्मक सोच बदल कर सफलता पाने के लिए सबसे पहले सपने देखना होगा इसका अर्थ यह नहीं की सिर्फ सपने ही देखते रहें वरण उन सपनों को सच में बदलने के लिए सकारात्मक सोच के साथ उस दिशा में बढ़ना होगा, क्योंकि सफलता या कामयाबी अच्छे किस्मत वालों को नहीं वरण जीवन के प्रति सकारात्मक सोच रखने वालों को मिलाती है।

व्यक्तित्व विकास

आज शाम को महिलाओं की पत्रिका 'गृहलक्ष्मी ' पढ़ रही थी उसमे एक स्तम्भ 'व्यक्तित्व विकास ' पढ़ी उसमे कुछ पाठको ने आपने वय्क्तिताव की खामियों व उसके विकास से सम्बंधित कुछ सवाल किये थे जिनका उत्तर हमारे लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है अतः आप सबके लिए उन्ही के कुछ अंश :-
बोलना :- सहीं बोलें, समय पर बोलें , सहीं व्यक्ति के सामने बोलें, संक्षिप्त बोलें, सप्रमाण बोलें और सहीं शैली में बोलें। आवश्यकता से ज्यादा
बोलने से गरिमा कम होती है। कम बोलने से भावनाएं ठीक से व्यक्त नहीं हो पाती, अंतत: बैलंस जरुरी है।
व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत :- 'सकारात्मक सोच ' व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत होती है। यदि सोच सहीं होगी तो कार्य भी होगा । यदि सोच गलत होगी तो शुरुआत हई गलत हो जायगी। यदि सोच में हीनभावना या नकारात्मक होगी तो आप कोई भी कार्य मन से नहीं कर पाएंगे। इसलिए अच्छा सोचें, अपने बारे में और दुनिया के भरे में भी। सहीं सोचेंगे तो ही समस्यायों का समाधान ढूंढ़ पाएंगे। नहीं तो स्वयं समस्या बनकर रह जायेंगे।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

पितृ देवो भवः

पिता देव है। माँ की ममता धरती से भी भरी है और पिता का स्थान आकाश से भी ऊँचा है, क्योंकि बेटे के लिए पिता के अरमान आकाश से भी ऊँचे होते हैं।
दुनिया में कोई किसी को अपने से आगे बढ़ता और ऊँचा उठता नहीं देख सकता। एक पिता हई है, जो अपनी संतान को अपने से सवाया होता हुआ देख कर खुश होता है।
देश के नौजवानों ! अपने पर्स में रूपये की जगह अपने पिता की तस्वीर रखिये क्योंकि उस तस्वीर ने हई तुम्हारी तक़दीर संवारी है। पेड़ बुध हई संही, आँगन में लगा रहने दो। फल न संही , छाँव तो देगा।

अब समझ आया

मेरे पतिदेव इसे कंही से लाये थे। अब आप सब के साथ बाँट रही हूँ।
अपने जीवनकाल में उम्र के हर पड़ाव पर हर व्यक्ति का अपने पिता की ओर देखने का नजरिया
४ वर्ष की आयु में - मेरे पितेजी महान हैं।
६ वर्ष की आयु में - मेरे पिता सबकुछ जानते हैं।
१० वर्ष की आयु में - मेरे पिता बहुत अच्छे हैं, लेकिन गुस्सा बहुत जल्दी होते हैं।
१३ वर्ष की आयु में - मेरे पिता बहुत अच्छे थे जब मै छोटा था।
टीन एज का प्रारम्भ
१४ वर्ष की आयु में - मेरे पिताजी बहुत तुनकमिजाज होते जा रहे हैं।
१६ वर्ष की आयु में - पिताजी ज़माने के साथ नहीं चल पाते, बहुत पुराने ख्यालात के हैं।
१८ वर्ष की आयु में - पिताजी तो लगभग संकी हो चले हैं।
२० वर्ष की आयु में -हे भगवन अब तो पिताजी को झेलना मुश्किल होता जा रहा है, पता नहीं माँ उन्हें
कैसे सहन कर पाती हैं।
२५ वर्ष की आयु में - पिताजी तो मेरी हर बात का विरोध करतें हैं।
३० वर्ष की आयु में - मेरे बच्चे को समझाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है, जबकि मै अपने पिताजी
से बहुत डरता था, जब मै छोटा था।
४० वर्ष की आयु में - मेरे पिताजी ने मुजको बहुत अनुशासन के साथ पाला। मुझे भी अपने बच्चे के
साथ ऐसा हई करना चाहिए।
४५ वर्ष की आयु में - मै आश्चर्यचकित हूँ कि कैसे मेरे पिता ने हमें बड़ा किया होगा।
५० वर्ष की आयु में - मेरे पिता ने हमें यंहा तक पहुचने के लिए बहुत कष्ट उठाये, जबकि मै अपनी
औलाद कि देखभाल हई ठीक से नहीं कर पाता।
५५वर्श की आयु में - मेरे पिताजी बहुत दूरदर्शी थे और उन्होंने हमारे लिए कई योजनाएं बनाईं थीं। वे
अपने आप में बेहद उच्चकोटि के इंसान थे।
६० वर्ष की आयु में - वाकई मेरे पिताजी महान थे।
अर्थात ' पिता महान है' इस बात को पूरी तरह से समझने में व्यक्ति को ५६ वर्ष लग जाते हैं।